छपरा(बिहार)जिले में कालाजार के मरीजों की निगरानी और उपचार के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नई पहल की है। पिछले पांच वर्षों में जिले में 1468 मरीजों की पहचान हुई है। इन सभी मरीजों का फॉलोअप किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उपचार के बाद वे दोबारा लक्षणों से ग्रसित तो नहीं हो रहे हैं। जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. दिलीप कुमार सिंह ने बताया कि सभी मरीजों की लाइन-लिस्ट तैयार कर ली गई है। अब स्वास्थ्य विभाग और सहयोगी संस्थाएं जैसे डब्ल्यूएचओ, जीएचएस, सीफार और पिरामल के प्रतिनिधि इनका फॉलोअप करेंगे। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि मरीजों में पोस्ट-कालाजार डर्मल लीशमैनियासिस (पीकेडीएल) जैसे लक्षण तो विकसित नहीं हो रहे हैं। पीकेडीएल यानी त्वचा कालाजार का इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए मरीज को लगातार 12 सप्ताह तक दवा लेनी पड़ती है। सही समय पर उपचार से रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। सरकार इस बीमारी के इलाज के लिए आर्थिक सहायता भी देती है। पीकेडीएल के मरीज को इलाज के बाद 4000 रुपये का अनुदान दिया जाता है। वीडीसीओ अनुज कुमार ने बताया कि कालाजार मादा फाइबोटोमस अर्जेंटिपस (बालू मक्खी) के काटने से फैलता है। यह मक्खी लीशमैनिया परजीवी का वाहक होती है। संक्रमित व्यक्ति का खून चूसने के बाद जब यह मक्खी किसी और को काटती है, तो संक्रमण फैल जाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है और आंतों तक पहुंच सकती है। मुख्यमंत्री कालाजार राहत योजना के तहत मरीजों को आर्थिक सहायता दी जाती है। वीएल (ब्लड रिलेटेड) कालाजार के मरीज को 6600 रुपये राज्य सरकार और 500 रुपये केंद्र सरकार की ओर से मिलते हैं। वहीं, पीकेडीएल के मरीजों को केंद्र सरकार की ओर से 4000 रुपये दिए जाते हैं। कालाजार के लक्षणों में बार-बार या तेज बुखार आना, वजन कम होना, कमजोरी, मक्खी के काटे स्थान पर घाव और प्लीहा में नुकसान शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग का यह कदम कालाजार उन्मूलन की दिशा में अहम साबित होगा।
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