छपरा:मशरख प्रखंड के देवरिया गांव में आयोजित नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का समापन सोमवार को हुआ। समापन समारोह में महामंडलेश्वर गजेंद्र दास और फलहारी बाबा ने बीके आराधना बहन और पूनम बहन को शॉल देकर सम्मानित किया। यह यज्ञ 21 से 29 अप्रैल तक चला। आयोजन प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किया गया।
यज्ञ में श्रद्धालुओं को अध्यात्म, हवन, समय चक्र, राजयोग और नशा मुक्ति जैसे विषयों पर जागरूक किया गया। संचालिका आराधना बहन ने बताया कि यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विज्ञान, अध्यात्म और मनोविज्ञान का संगम है। हवन और आहुति से आत्मा शुद्ध होती है। वातावरण में दिव्यता आती है। समय चक्र के साथ इसका तालमेल ब्रह्मांडीय ऊर्जा को नियंत्रित करता है। राजयोग की साधना में यह सहायक बनता है।
आराधना बहन ने कहा कि यज्ञ भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें अग्नि में सामग्री अर्पण केवल प्रतीक है। असल में यह आत्मशुद्धि, ऊर्जा संतुलन और ब्रह्मांडीय चक्रों को सुसंगत करने की विधि है। हवन में दी जाने वाली आहुति हमारी इन्द्रियों, विकारों और इच्छाओं की बलि होती है। घी, जड़ी-बूटियां और लकड़ी अग्नि को समर्पित की जाती हैं। अध्यात्म में यह समर्पण अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और भ्रम का होता है।
उन्होंने बताया कि श्रद्धा और नियमपूर्वक दी गई आहुति से मानसिक कंपन ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ता है। इससे साधक दिव्यता की ओर बढ़ता है। वेदों में कहा गया है, “अग्निर्देवानामवसः”। यानी आहुति से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह वातावरण को शुद्ध करती हैं। साधक के मन को शांत करती हैं। यह ऊर्जा मन और प्राण को संतुलित करती है। इससे ध्यान और राजयोग की स्थिति प्राप्त होती है। इसी कारण अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है।
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