सारण से लेकर पटना तक के मध्य लगभग 50 से अधिक पुरास्थल प्राप्त हो सकते हैं डॉ. श्याम प्रकाश

सारण बिहार

डोरीगंज स्थित चिरांद के प्रकाश में आने के पश्चात से हमें ज्ञात है कि सारण नवपाषाण काल से ही मानवीय गतिविधियों के सम्पर्क में आ चुका था। इस क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली घाघरा नदी अपने अंचल में न जाने कितने प्राचीन स्थलों को छुपाये बैठी है। यदि घाघरा की घाटी में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य किया जाए तो बहुत सम्भव है कि सारण से लेकर पटना तक के मध्य लगभग 50 से अधिक पुरास्थल प्राप्त हो सकते हैं जिनके आधार पर प्राप्त संस्कृतियों के आलोक में सारण के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ने की संभावना है। किंतु इसके लिए विधिवत पुरातात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में पुरातात्विक कार्य अत्यंत अल्प मात्रा में हुआ है। जिसके चलते पुरातत्त्व वैज्ञानिक सारण के अनेकों पुरास्थलों से अनभिज्ञ रह गए जो अधिकतर घाघरा के किनारे स्थित हैं।

डॉ. श्याम प्रकाश और डॉ बाल्मीकि कुमार

पुरातात्विक सर्वेक्षण के क्रम में सारण स्थित रिविलगंज बाज़ार से प्राप्त पुरास्थल छपरा- माँझी मुख्य सड़क मार्ग के बाएं किनारे पर स्थित है। यहाँ के पुरास्थल के विषय में जानकारी हमारे एक M.A. के छात्र रजनीकांत सिंह ने दी। ततपश्चात इस पुरातात्विक स्थल पर पहुंचकर सर्वेक्षण कार्य किया गया। इस सर्वेक्षण कार्य में राम जयपाल महाविद्यालय, छपरा के इतिहास विभाग के शिक्षक डॉ बाल्मीकि कुमार का सहयोग प्राप्त हुआ।
यह पुरास्थल 25° 48′ 17.83” उत्तरी अक्षांश एवं 84° 42′ 22.24″ पूर्वी देशांतर के मध्य रिविलगंज बाज़ार में स्थित है। सामान्य धरातल से इसकी ऊँचाई लगभग 7 मीटर है। टीले के ऊपर एक आधुनिक मन्दिर निर्मित है।
इस पुरास्थल के धरातलीय सर्वेक्षण से प्रमुखतः तीन प्रकार की पुरासंस्कृतियों के विषय में सूचना प्राप्त होती है।
प्रथम संस्कृति – इसको उत्तरी कृष्णमार्जित मृद्भाण्ड (NBPW) संस्कृति से सम्बंधित किया जा सकता है। इस संस्कृति से सम्बंधित काले एवं लाल रंग के मृद-पात्रों की प्राप्ति होती है। नमूना संग्रह के लिए कटोरे, थाली, तश्तरी, बाहर की तरफ हल्की सी झुकी हुई हांडी का चयन किया गया है। किंतु अनेक आकर विहीन मृद-पात्रों के टुकड़ों को संग्रहित किया गया है। इनमें से अधिकांशतः काले रंग से लेपित कोटरों, तश्तरियों एवं थालियों के टुकड़े हैं। काले रंग के साथ-साथ कुछ पात्र भूरे रंग के भी प्राप्त होते हैं किंतु इन सब पात्र-खण्डों पर किसी प्रकार का कोई अलंकरण नहीं किया गया है। परन्तु कुछ पात्र ऐसे हैं जिनको देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि सम्भवतः इस पुरास्थल पर चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के अंश विद्यमान हैं किंतु इस विषय में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता इस बात की पुष्टि के लिए इस पुरास्थल का पुरातात्विक उत्खनन कार्य अवश्यम्भावी है। प्राप्त मृद-पात्रों में कुछ मध्यम एवं कुछ पतले गढ़न एवं छोटे आकार के हैं।

केवल एक लाल रंग के थाली का टुकड़ा मध्यम मोटाई का है यह भी उत्तरी काली चमकीली पात्र-परम्परा वाली संस्कृति से सम्बंधित जान पड़ता है। यहाँ से एक कृष्ण-लोहित प्रकार का मृद-पात्र मिला है जिसके अंदर का भाग काला एवं बाहर का भाग पूर्णतः लाल है। सम्भवतः इस पात्र-खण्ड का भी सम्बन्ध उत्तरी काली चमकीली पात्र-परम्परा वाली संस्कृति से हो अथवा बहुत सम्भव है कि यह पात्र-खण्ड इस संस्कृति से भी प्राचीन संस्कृति से सम्बद्ध हो। गंगा घाटी में इस प्रकार के पात्रों का सम्बंध ताम्र-पाषाण कालीन संस्कृति, चित्रित धूसर मृद पात्र-परम्परा वाली संस्कृति, उत्तरी काली चमकीली मृद पात्र-परम्परा वाली संस्कृति, तथा बाद तक की संस्कृतियों के साथ स्थापित किया जाता है। अतः इस पात्र का सम्बन्ध यहाँ स्थित किस संस्कृति से था यह बता पाना दुरूह कार्य है। समस्त पात्रों को पकाने से पहले काले रंग से लेपित किया गया है इसीलिए ये पात्र अत्यंत चमकदार हैं किंतु इन पर किसी प्रकार के अलंकरण का आभाव है। समस्त पत्रों में मेटल की सी खनक है।


ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो उत्तरी काली चमकीली मृद-पात्र परम्परा वाली संस्कृति द्वितीय नगरीय क्रांति एवं बुद्धकाल से सम्बद्ध मानी जाती है जो लगभग 600 ईसा पूर्व के आस-पास का समय है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि इसी काल में पंचमार्क अर्थात आहत सिक्कों का भी प्रचलन हो चुका था जिसकी प्राप्ति, तक्षशिला, कौशाम्बी जैसे उत्तर भारतीय प्राचीन नगरों से होती है। उत्तरी काली चमकीली मृद-पात्र परम्परा को प्रकाश में लाने का श्रेय भारतीय पुरातत्त्व विभाग के दूसरे महानिदेशक सर जान मार्शल को है। उन्होंने ही सर्वप्रथम पाकिस्तान स्थित तक्षशिला के भीर नामक टीले के पुरातात्विक उत्खनन के क्रम में इस संस्कृति से सम्बंधित मृद-पात्रों के ठीकरों को प्राप्त किया जिसको उन्होंने यूनानी पात्र परम्परा की अनुकृति मात्र माना। इसके पश्चात जब वाराणसी के निकट भीटा नामक पुरास्थल से भी उनको इसी प्रकार के पात्रों की प्राप्ति हुई तब उन्होंने इसे पूर्णतः भारतीय मान लिया इसके पहले लम्बे समय तक इस संस्कृति को विदेशी माना जाता रहा। इसके पश्चात सम्पूर्ण गंगा घाटी क्षेत्र से इस प्रकार के मृद-पात्र प्राप्त हुए जो लगभग 600 ईसा पूर्व के आस-पास के पुरातात्विक अवशेषों के साथ प्राप्त हुए इसी कारण से इस संस्कृति को छठीं शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाने लगा हालांकि कुछ नवीन आधुनिक अनुसंधानों में इस प्रकार के मृद-पात्र परम्परा वाली संस्कृति का समय गंगा घाटी के कई स्थलों पर लगभग 1200 ईसा पूर्व तक माना जा रहा है। इस प्रकार के मृद-पात्र पश्चिम में अफगानिस्तान में बेग्राम, पाकिस्तान में तक्षिला (जिला-रावलपिंडी), चरसद्दा, उदयग्राम, गुजरात (भारत) तथा उत्तर में तिलौराकोट (नेपाल), दक्षिण में महाराष्ट्र तथा पूर्व में चंद्रकेतुगढ़ (पश्चिम बंगाल) दीनाजपुर (बांग्लादेश), शिशुपालगढ़ (उड़ीसा) एवं बिहार के सोनपुर, वैशाली, गया, मांझी एवं चिरांद (सारण) आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

द्वितीय संस्कृति – यह कुषाण काल से सम्बंधित है। नमूना संग्रह के रूप में इस काल से सम्बद्ध केवल लाल रंग के तीन कटोरों का चयन किया गया है जिनमें से दो बाहर की तरफ़ फ़ैलते मुँह वाले हैं इनमें से एक में रिम के अंदर हल्की सी कटान दृष्टिगत है। इसके अतिरिक्त तीसरे कटोरे के रिम के नीचे अवतल कटान स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है जो कुषाण काल का प्रमुख मृद-पात्र है।
पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस संस्कृति का सूत्रपात चीन से आयी हुई एक खानाबदोश एवं बर्बर जाति द्वारा किया गया जिनको कुयुं-सांग कहा जाता था ये मध्य एशिया एवं अफगानिस्तान के ख़ैबर दर्रे तथा हिन्दुकुश पर्वत श्रृंखलाओं को पार कर भारत में आये थे इनका मुखिया कुजुलकैडफिसेस था जो अफगानिस्तान से आगे न बढ़ सका। मार्ग में आने वाला प्रथम कुषाण नेता विम कैडफिसेस था जिसने सिंध एवं पंजाब वाले क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक कनिष्क प्रथम हुआ जिसने अफगानिस्तान से लेकर पाटलिपुत्र (पटना) तक की विजय की थी। उसने अनेक अभिलेखों को उत्कीर्ण करवाया जिससे उसके शासन अवधि के विषय में सूचना प्राप्त होती है। हाल ही में अफगानिस्तान के रबतक नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख से कुषाणों की वंशावली मिली है जिसके आधार पर यह सिद्ध हो गया कि कनिष्क इसी कुल से सम्बंधित था।

कनिष्क ने दो स्थापत्य कला केन्दों का निर्माण किया जिसमें से एक गांधार (पाकिस्तान) तथा दूसरा मथुरा (भारत) में स्थित था। इन केंद्रों पर अत्यंत कलात्मक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किया गया जिनको अलग-अलग नगरों में विक्रय किया जाता था। मथुरा में बनी मूर्तियाँ चित्तीदार लाल बलुए पत्थर पर तथा गांधार से प्राप्त मूर्तियाँ स्लेटी रंग के बलुए पत्थर पर निर्मित हैं। बुद्ध मूर्तियों के अतिरिक्त हारिति एवं अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी बनाई गईं। कनिष्क ने अपने समय में कश्मीर के कुण्डलवन में वसुमित्र एवं अश्वघोष की अध्यक्षता में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया उसने अपने सिक्कों पर बुद्ध, कार्तिकेय, शिव तथा पार्वती के साथ-साथ ईरान, इराक एवं मध्य एशिया के देवी देवताओं का भी अंकन करवाया जिसका प्रमुख कारण मध्य एशिया से होकर जाने वाले रेशम मार्ग पर कब्ज़ा करना था। चूंकि भारत से व्यापार अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया को होता था अतः अपने सिक्कों पर यहाँ के देवी-देवताओं का अंकन उसके द्वारा करवाया गया। भारत में कुषाण काल के अवशेष लगभग सम्पूर्ण गंगा घाटी क्षेत्र से प्राप्त होते हैं। यह एक नगरीय संस्कृति थी जिसमें पकी मिट्टी के ईंटों की सहायता से भवनों का निर्माण किया गया था। इस समय शिल्प, स्थापत्य, कला वाणिज्य-व्यापार इत्यादि चर्मोत्कर्ष पर था। पाटलिपुत्र अभियान के क्रम में रिविलगंज के पुरास्थल पर कनिष्क आया था अथवा नहीं इस विषय में किसी भी प्रकार की सूचना का अभाव है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सम्भवतः ऊँचा स्थान देखकर इस काल के लोगों ने यहां अपना निवास स्थान बना लिया होगा।


तृतीय संस्कृति – इसका सम्बन्ध मध्यकालीन संस्कृति से है। रिविलगंज पुरास्थल पर इस संस्कृति से सम्बंधित मृद-पात्र खण्ड प्रचुर मात्रा में बिखरे पड़े हैं जिनमें मोटे, मध्यम एवं पतले गढ़न में हांडी, कलश, जार (संग्रह पात्र) कटोरे, कुल्लहड़ आदि का उल्लेख प्रमुखता से किया जा सकता है। ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि सारण पर दिल्ली सल्तनत के राजाओं, मुग़लों, डचों, फ्रांसीसियों एवं अंग्रेजों का आधिपत्य रहा है। डचों के समय में यहाँ से शोरे का उत्पादन प्रभूत मात्रा में किया जाता था जिसका प्रयोग बम एवं अन्य विस्फोटक बनाने में होता था। स्थानीय बताते हैं कि यहाँ रिविल नामक एक अंग्रेज रहा करता था जो इस क्षेत्र में अंगूर तथा नकदी फसलों आदि की खेती करवाता था। पुरास्थल के समीप उसके काल का एक जर्जर स्कूल एवं उसका मकबरा स्थित है। इसी रिविल के नाम पर इस स्थान का नाम रिविलगंज पड़ गया। ऐसी मान्यता है कि पुरास्थल के समीप ही अहिल्या आश्रम है जहाँ त्रेतायुग में दशरथ पुत्र श्रीराम यहाँ आये थे। इस प्रांगण में लगभग 200 वर्ष पूर्व बना एक मंदिर है जहाँ पर कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं ये भी लगभग 200 वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं हैं। श्रीराम चरण शिला भी रखी हुई है जो आधुनिक तकनीकि से निर्मित की गई है।


समस्त अवलोकन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रिविलगंज पुरास्थल पर लगभग छठीं शताब्दी ईसा पूर्व में मानव अधिवास निर्मित हुए जो कुषाण काल तक अनवरत चलते रहे किन कारणों से यहाँ गुप्तकाल के साक्ष्य नहीं मिल पाए यह चिंता का विषय है किंतु मध्यकाल तक यह क्षेत्र मानव बस्तियों से पूर्णतः आबाद हो चुका था। जिसमें घाघरा नदी के जल का महत्वपूर्ण स्थान है।सारण जनपद स्थित कौतुकालक्षी नामक पुरास्थल का सर्वेक्षण कार्य डॉ श्याम प्रकाश (पुरातत्त्व वैज्ञानिक एवं इतिहासकार) अतिथि सहायक प्राध्यापक, इतिहास विभाग, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, सारण, बिहार एवं डॉ बाल्मीकि कुमार (इतिहासकार) राम जयपाल कॉलेज, छपरा, बिहार द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इस पुरास्थल पर मानवीय गतिविधियों के चलते टीला पूर्णतः क्षतिग्रस्त हो चुका है। वर्तमान में इस पुरास्थल का उपयोग ईंट पाथने के लिए किया जा रहा है। यहाँ के समतल धरातल से अनेक सांस्कृतिक कालों के पुरावशेष विशेषतयः मृदभाण्डों की प्राप्ति होती है। यहाँ के धरातलीय पुरातात्विक सर्वेक्षण से लाल बलुए पत्थर पर निर्मित दो मूर्तियों की प्राप्ति हुई है जिनमें से एक किसी स्थानीय योगी तथा दूसरी स्थानीय देवता की है।
कौतुकालक्षी पुरास्थल से प्राप्त प्राप्त संस्कृतियां :-
इस पुरास्थल के पुरातात्विक सर्वेक्षण से कुषाण काल, पूर्वमध्य, मध्य एवं आधुनिक काल की संस्कृतियों की प्राप्ति होती है।
प्रथम संस्कृति – कुषाण काल :- इस पुरास्थल से प्राप्त प्रथम संस्कृति कुषाण कालीन है। नमूना संग्रह के लिए लाल रंग से निर्मित फैलते मुँह वाले कटोरों के साथ-साथ रिम के नीचे अवतल कटान वाले कटोरों का संग्रह किया गया है जो मध्यम मोटे एवं पतले गढ़न में निर्मित हैं।
द्वितीय संस्कृति – पूर्वमध्य काल :- इस काल से सम्बंधित नमूनों के संग्रह में लाल रंग के चाकू की धार सदृश रिम वाले कटोरों के साथ – साथ मध्यम मोटे एवं पतले गढ़न में निर्मित लाल रंग की हांडियों के मृद पात्र-खण्डों की प्राप्ति हुई है।
तृतीय एवं चतुर्थ संस्कृति – मध्य एवं आधुनिक काल :- इन सांस्कृतिक कालों के अनेक नमूनों का संग्रह किया गया है। इनमें कटोरे, घड़े, हांडियाँ, कलश, ग्लेज़्ड मृद पात्र-खण्ड, सल्तनत एवं मुग़ल कालीन टोंटीदार मृद पात्र-खण्डों की प्राप्ति हुई है। समस्त पात्र खण्ड मोटे, मध्यम एवं पतले गढ़न में निर्मित हैं।
कौतुकालक्षी पुरास्थल के इसी चरण से लाल बलुए पत्थर पर निर्मित योगी एवं स्थानीय देवता की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इनके इस स्थल पर प्राप्त होने से यह कहा जा सकता है कि लगभग 100-200 वर्ष पहले यहाँ कोई मंदिर रहा होगा।
कौतुकालक्षी गावँ में ठोस ईंटों से निर्मित एक गोल संरचना दिखलाई देती है। बहुत सम्भव है कि यह कोई बौद्ध स्तूप रहा हो। विधिवत सर्वेक्षण के पश्चात ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।

सर्वेक्षणकर्ता

डॉ. श्याम प्रकाश पुरातत्त्व वैज्ञानिक एवं इतिहासकार अतिथि सहायक प्राध्यापक इतिहास विभाग जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा
एवं डॉ बाल्मीकि कुमार इतिहासकार राम जयपाल कॉलेज, छपरा

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