चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के एक ऐसे चमकते सितारे थे जिनकी बराबरी का दूसरा बड़ा नेता अबतक नहीं हो सका-डॉ. लाल बाबू यादव

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर जी का आज 93वां जन्म जयंती है ।चंद्रशेखर जी भारतीय राजनीति के एक ऐसे चमकते सितारे थे जिनकी बराबरी का दूसरा बड़ा नेता अबतक नहीं हो सका साठ के दशक के कांग्रेस के युवा तुर्क नेताओ जिनमे रामधन, कृष्णकांत, चंद्रजीत यादव , के.डी मालवीय इत्यादि में चंद्रशेखर जी लीड पोजीशन में थे जिस तरह 1931-32 में कांग्रेस के अंतर्गत समाजवादी विचारकों ने आचार्य नरेंद्र देव ,अच्युत पटवर्धन ,जयप्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहर लोहिया आदि के नेतृत्व में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी और इस प्रेसर ग्रुप के चलते कांग्रेस ने जमींदारी उन्मुल्लन का एजेंडा एक अर्थ सामंती पार्टी होते हुए भी अपने लक्ष्य में निर्धारित किया था। वैसे ही चंद्रशेखर का युवा तुर्क लॉबी श्रीमती इंदिरा गांधी को बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने तथा राजाओं के प्रिवी पर्स ख़त्म करने को बाध्य कर दिया और अंततः 1971 के लोकसभा चुनाव में श्रीमती गांधी को गरीबी हटाओ के नारे के कारण लोकसभा में अपार बहुमत प्राप्त हुआ ,मेरे विचार से इन बदलावों के पीछे चंद्रशेखर जी की नेतृत्व वाली इसी समूह का हाथ है।

स्वभाव से विद्रोही और जनसरोकारों से जुड़े रहने वाले चंद्रशेखर श्रीमती गांधी के द्वारा पेशकश की गई कई प्रमुख पदों को अस्वीकार कर अंततः केंद्र में पहली बार गठित गैर कांग्रेसी सरकार को बनाने में भी अपनी महती भूमिका निभाई। जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चंद्रशेखर भारत के प्रधानमंत्री के पद के लिए जेपी के पहले पसंद थे परंतु उन्होंने बाबु जगजीवन राम के लिए इस प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया की वे चाहते थे कि भारत के प्रधानमंत्री के पद पर एक दलित बैठे परंतु जनता पार्टी के ब्राम्हणवादी तत्वो ने एक साजिश कर के जेपी एवं कृपलानी को धत्ता बताकर मोरारजी देसाई को भारत के प्रधानमंत्री के पद पर (जो घोषित रूप से पूंजीपतियों के पक्षधर थे ) को बैठा दिया और आज हीं की तरह भारत का मुख्यकार्यपालक का पद पश्चिम के एक छोटे राज्य गुजरात में चला गया। चंद्रशेखर जी इन परिवर्तनों से न सिर्फ चकित थे बल्कि चिंतित भी थे यह सही है कि उन्हें थोड़े समय के लिए कुवैत युद्ध के दौरान भारी उथल पुथल के बीच प्रधानमंत्री का पद संभालना पड़ा परन्तु कांग्रेस को यह रास नहीं आयी की जनता का ऐसा सेवक देश के सर्वोच्च पद पर बैठे और थोड़े ही समय के बाद अपना समर्थन वापिस ले लिया और भारत को सच्चे लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रतिस्थापित करने का उनका सपना अधूरा ही रह गया।


मुझे इस बात का फक्र है कि जब चंद्रशेखर बलिया के साथ ही महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए वे छपरा के समाहरणालय में नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए आये थे और मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप प्रधानमंत्री के पद के उमीदवार है चंद्रशेखर जी ने बड़े ही शालीनता से मुस्कुरा कर मेरे इस प्रश्न को टाल दिया था परंतु चंद्रशेखर जी उस वक्त तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रधानमंत्री बने यानि नियति ने उनका साथ दिया मैंने वर्ष 1992 में सिताबदियारा के जेपी स्मारक ट्रस्ट में पुनः उनको उपयुक्त वाक्या याद दिलाया तो उन्होंने जगदीश भाई की उपस्थिति में यह स्वीकार किया कि मैं इसतरह का प्रश्न पूछने वाला पहला कस्बाई पत्रकार था।
चंद्रशेखर जी जैसा वक्ता या भाषण करने वाला मैंने अबतक दूसरा व्यक्ति नहीं देखा मैं ऐसे सिर्फ दो चंद्रशेखर को जानता हूं जिनके वक्तव्य शैली का अनुशरण पिछले चालीस वर्षो से करते रहने के बाद भी मैं अबतक उनदोनो से काफी पीछे रह गया हूँ।

माननीय चंद्रशेखर जी के अतिरिक्त दूसरे चंद्रशेखर बीहट के कम्युनिस्ट नेता कामरेड चंद्रशेखर भाई थे। अस्सी के दश्क में माननीय चंद्रशेखर जी ने उत्तर से दक्षिण तक कि एक विशाल भारत यात्रा की थी जो राजनीति का एक ऐसा पहला प्रयोग था जिसका अनुसरण आज भी छोटे बड़े नेता स्थानीय स्तर पर करते आ रहे है ,परंतु चंद्रदेखर जी के भारत यात्रा की बराबरी किसी ने आजतक नहीं की है। इन यात्राओं का रिपोतार्ज उस वक़्त के राजनितिक पत्रिका ‘दिनमान’ एवं आनंद बाजार पत्रिका समूह के उदयन शर्मा द्वारा संपादित ‘रविवार’ के पुरानी फाइलों में मिल जायेगा ।मेरी जानकारी एवं ज्ञान विस्तार में इस तरह के दर्जनों पत्र पत्रिकाओं तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन के पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान है यह एक मात्र संयोग ही है कि प्रति वर्ष अप्रैल का पहला पखवाड़ा मुझे अपने जीवन आदर्श के नायकों यथा 09 अप्रैल राहुल जयंती, 11 अप्रैल महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती,13 अप्रैल बी.पी मंडल की पुण्यतिथि, 14 अप्रैल संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर जयंती तथा 17 अप्रैल माननीय चंद्रशेखर जी की जयंती पर उनके विचारों के साथ चिंतन मनन करने का अवसर प्राप्त होता है और भविष्य में भी मैं इसे जारी रखूँगा।
मेरे विचारों में माननीय चंद्रशेखर जी का स्थान सर्वोपरि है उनके 93 वें जन्म जयंती पर मैं उन्हें विनम्रता पूर्वक श्रद्धा भाव से शत शत नमन करता हूँ।

इस लेख में जो भी विचार है वह लेखक का है‘गौरी किरण’ का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है
लेखक -डॉ. लाल बाबू यादव (पूर्व विभागध्यक्ष स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग
‌जयप्रकाश विश्विद्यालय छपरा (बिहार)

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