हर बच्चा अपनी तरफ से एक सशक्त भारत का सपना देखता था

आज से 25-30 साल पहले जब स्कूल में थे तो एक विषय पर निबंध का बहुत प्रचलन था ” 21वी सदी का भारत” हर बच्चा अपनी तरफ से एक सशक्त भारत का सपना देखता था। बच्चे थे असलियत पता ही नही थी। उस वक्त पता ही नही था कि देश मे कोई भूख से भी मरता होगा। करोडो लोग मजदूरी करते है उनकी क्या समस्याएं है इससे बिल्कुल अनभिज्ञ । ये लगता था कि शिक्षा प्राप्त करने में किसी को कोई दिक्कत नहीं है। रोजगार भी एक समस्या है पढ़ाई पूरी होने के बाद पता लगा। विद्यार्थी जीवन दिवास्वपन सा लगता था सब बढ़िया । जैसे जीवन में किसी को कोई तकलीफ नही होती। जीवन तो एक वरदान है ।आखिरकार जिसका बेसबरी से इंतजार था वह 21 वी सदी भी आई। शुरुवात खूब बढ़िया । भारत के लोगों का एक ही सपना हमारा देश दुनिया मैं अव्वल नंबर पे हो। सभी सामूहिक प्रयास करते नजर भी आ रहे थे।

अचानक सामाजिक समरसता पर हमले होने लगे। एक ऐसा भारत सामने आया जिसकी कल्पना भी नही की थी। सताधारी खुद समाज में वैमनस्य घोलते नजर आये वह भी सरेआम। हर इलाके में जाती या धर्म के नाम पर लोगों को देखा जाने लगा। 21वी सदी में हमारी बेरोजगारी ने 40 साल का रिकार्ड तोड दिया। भुखमरी से ग्रसित देशो की ranking में लगातार फिसलते जा रहे है। Happiness index हमारे पडोसी देश जिनकी हम बुराई करते नही थकते उनसे भी कम है।
वर्तमान मे ऐसा लग रहा है जैसे मजदूर तो जैसे इस देश के नागरिक ही नहीं है। इतना भेदभाव । मजबूरी वाले हालात तो है परन्तु इतने हैं क्या कि मानवता भी शर्मसार हो जाए । तस्वीरें इतनी भयावह है कि लगता नही कि हमारे देश में जहाँ राष्ट्रवाद को लेकर लम्बी लम्बी चर्चाए होती है वहा नागरिकों के प्रति इतनी असंवेदनशीलता भी हो सकती है।
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्तया सेन ने अपनी किताब ” गरीबी और अकाल ” में लिखा है कि अकाल सरकार की अकुशलता के कारण आते है।

इस लेख में जो भी विचार है वह लेखक का है “गौरी किरण” का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है

लेखकनरेंद्र कुमार सहायक प्राध्यापक भौतिकी विभाग डी.एन.कॉलेज हिसार हरियाणा

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