नाच के गुमनाम एवं बदनाम कलाकर को नामी-गिरामी सम्मान

भिखारी ठाकुर के रंगसंगी है रामचंद्र माँझी

बिहार(कला)भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध हस्ताक्षर भिखारी ठाकुर के रंगसंगी रामचन्द्र माँझी को ‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान 2017’ प्रदान किया गया है। इस सम्मान से देश के कई रंगकर्मियों, विद्वानों, सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं में ख़ुशी की लहर है। प्रिंट मीडिया से ले कर सोशल मीडिया तथा व्यक्तिगत तौर पर भी रामचन्द्र माँझी को इस सम्मान के लिए बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ है। ऐसे कहा जा रहा है कि यह सम्मान भिखारी ठाकुर को सम्मानित करने जैसा है। परंतु आज से 3-4 वर्ष पहले तक रामचंद्र माँझी को बहुत कम ही लोग जानते थे। इस आलेख के माध्यम से हमारा प्रयास है कि हम न सिर्फ़ रामचंद्र माँझी के बारे में विस्तार से चर्चा करें बल्कि उनके परफ़ॉर्मेंस विधा ‘नाच’ विधा पर भी प्रकाश डालें। इसके साथ ही हमारा यह भी प्रयास है कि हम भिखारी ठाकुर रंगमंडल के कार्यों पर विस्तार से चर्चा करें।
रामचंद्र माँझी का परिचय
रामचंद्र माँझी बिहार की नाच परंपरा जिसे लौंडा नाच भी कहा जाता है के जीवित किवंदती लेकिन गुमनाम कलाकार रहे हैं। भिखारी ठाकुर से प्रशिक्षित एवं उनके साथ काम कर चुके जीवित बचे कलाकारों में से रामचंद्र माँझी सबसे वरिष्ठ ऐसे कलाकार हैं जो उम्र के 93वें वर्ष में भी लगातार भिखारी ठाकुर की नाच मंडली (अब भिखारी ठाकुर रंगमंडल) में भिखारी ठाकुर कृत हर नाटकों में मुख्य भूमिका निभाते हैं। रंगमंडल में स्त्री भूमिका करने के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। इन्होंने बिदेसिया नाटक में रखेलिन के किरदार को अपनी अभिनय, गायकी एवं नृत्य से एक ऐसी ऊँचाई प्रदान किया है जिसके आसपास फटकना भी आज के रंगकर्मियों के लिए चुनौती है।
छपरा (बिहार) के एक छोटे से गाँव तज़ारपुर में जन्मे रामचन्द्र माँझी दलित समुदाय के दुसाध जाति से हैं। रामचंद्र माँझी का जन्म का कोई लिखित प्रमाण नहीं है परंतु चुनाव पहचान पत्र के अनुसार उनका जन्म 1930 में हुआ है जबकि रामचंद्र माँझी अपनी यादों की गिनती से ख़ुद को 93 वर्ष का बताते हैं। श्री माँझी 12 वर्ष की उम्र में भिखारी ठाकुर के नाच दल से जुड़े थे। परंतु वो बताते हैं कि भिखारी ठाकुर से पहले उन्होंने गाँव के हीं दीनानाथ माँझी के नाच मंडली में नाच का प्रशिक्षण लेना एवं नाचना-गाना शुरू कर दिया था। उसके बाद उन्हें भिखारी ठाकुर के नाच पार्टी में शामिल होने का ऑफ़र मिला। जहाँ उन्होंने आंगिक-वाचिक अभिनय सहित धोबिया नाच, नेटुआ नाच, गजल, कव्वाली, निर्गुण, भजन, दादरा, खेमटा, कजरी, ठुमरी, पूर्वी, चइता गायन का गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के पश्चात भिखारी ठाकुर कृत सभी नाटकों में मुख्य कलाकार के रूप में अपनी भूमिका प्रदान की। रामचंद्र माँझी अब तक भिखारी ठाकुर के एक-एक नाटकों की हजारों हज़ार प्रस्तुतियाँ देश-विदेश के विभिन्न समारोहों एवं गाँव के शादी-विवाह तथा त्योहारों में कर चुके हैं। रामचंद्र माँझी अब तक मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जगजीवन राम, जयप्रकाश नारायण, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, राबड़ी देवी, शरद यादव, रामविलास पासवान तथा दारोगा राय जैसे देश के बड़े राजनेताओं के समक्ष अपनी प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं।
परंतु समाज में आज भी रामचंद्र माँझी के इस कला को सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता है। रामचंद माँझी हीं क्यों इस विधा से जुड़े हर कलाकार को समाज एवं परिवार में हे दृष्टि से देखा जाता है। आपको यह बताते हुए मुझे अपने समाज पर शर्म आ रही है कि रामचंद्र माँझी के नाच को आज तक उनके परिवार के लोगों ने नहीं देखा है।
भिखारी ठाकुर के नाटकों में रामचंद्र माँझी की भूमिका
बिदेसिया: रखेलिन/प्यारी सुंदरी
गबरघिचोर: गलीज बहु
बेटी-बेचवा: हजामिन
पिया निसइल: रखेलिन
गंगा-स्नान: मलेछू बहु
पुत्र-बध: छोटकी
भाई-बिरोध: छोटकी
कृष्णलीला: यशोदा
ननद-भाउजाई: भाउजाई
बिधवा-बिलाप: बिधवा स्त्री
भिखारी ठाकुर का परिचय
जन्म: 18 दिसंबर 1887 मृत्यु: 10 जुलाई 1971
भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के महान रंगकर्मीयों में से एक रहे हैं। सन 1917 में अपने नाच-नाटक दल की स्थापना कर भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी भाषा में बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-बिरोध, पिया निसइल, पुत्र वध, विधवा विलाप, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड आ नेटुआ सहित लगभग दर्जन भर नाटक एवं सैकड़ों गीतों की रचना की है। उन्होने अपने नाटकों और गीत-नृत्यों के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों को सहज तरीके से नाच के मंच पर प्रस्तुत करने का काम किया था। उनके नाटक आज भी प्रासंगिक हैं।
संगीत नाटक अकादमी सम्मान
संगीत नाटक अकादमी सम्मान भारत में गीत-संगीत, नृत एवं नाटक के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ सम्मान माना जाता है। रामचंद्र माँझी को यह पुरस्कार लोकरंगमंच के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जा रहा है। इस पुरस्कार को भारत के प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति प्रदान करते हैं। पुरस्कार स्वरूप 1 लाख रुपए नगद, ताम्रपत्र एवं अंगवस्त्र प्रदान किया जाता है। बिहार के रंगमंच में यह पहला अवसर है जब किसी नाच विधा के कलाकार को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हो रहा है।
नाच विधा क्या है?
‘नाच’ बिहार एवं पूर्वी उत्तर-प्रदेश का एक प्रचलित एवं जनप्रिय नाट्य रूप रहा है। नाच नाम होने की वजह से अज्ञानता वश प्रायः इसे नृत्य (डान्स) मान लिया जाय है। परंतु ऐसा नहीं है। नाच गीत-संगीत, नृत्य, नाटक, लबारी, कलाबाज़ी का एक मिला-जुला रूप है जो रात भर मंचित होता है। नाच में पुरुष कलाकार हीं ‘स्त्री-वेशधारण’ कर ‘स्त्री-भूमिका’ निभाते हैं। ‘स्त्री-वेशधारण’ कर नाचने वाले को ‘लौंडा’ कहा जाता है। इसलिए इस विधा को भो ‘लौंडा नाच’ कहा जाता है। परंतु ‘लौंडा’ शब्द समाज में एक गाली की तरह भी उपयोग में लाया जाता है। ‘नाच’ में ‘लौंडा’ शब्द को जोड़ कर इसे ‘लौंडा नाच’ कहने के पीछे कहीं न कहीं समाज की जातीय-वर्गीय दुराग्रह छुपी हुई है।
भिखारी ठाकुर रंगमंडल प्रशिक्षण एवं शोध केंद्र (छपरा, बिहार)
यह केंद्र भिखारी ठाकुर के नाच मंडली जिसकी स्थापना स्वयं भिखारी ठाकुर ने 1917 में किया था उसका पुनर्जीवित एवं संस्थानिक (revive and institutionalize) स्वरूप है। भिखारी ठाकुर के सानिध्य में प्रशिक्षण प्राप्त एवं उनके साथ काम कर चुके सभी जीवित कलाकार (जैसे: श्री रामचन्द्र मांझी बड़े, श्री लखिचन्द मांझी, श्री शिवलाल बारी एवं श्री रामचंद्र मांझी छोटे) आज इस रंगमंडल के अभिन्न अंग हैं।
भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी बेचवा, पिया निसइल, भाई विरोध, गंगा स्नान, पुत्र वध, विधवा विलाप, नाई बहार, नक़ल भांड आ नेटुआ सहित लगभग दर्जन भर नाटक और सैकड़ों गीतों की रचना अपने नाच दल के माध्यम से देश दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया था। 1971 में भिखारी ठाकुर के मरणोपरांत उनके परिवार एवं रिश्तेदारों में गौरीशंकर ठाकुर, शत्रुधन ठाकुर, दिनकर ठाकुर, रामदास राही ने उन के नाच दल को चलाया। जब भिखारी ठाकुर के परिवार एवं रिश्तेदारों ने नाच मंडली चलना छोड़ दिया तब भिखारी ठाकुर की मंडली टूट-बिखर गयी। फिर भिखारी ठाकुर के गाँव के बग़ल के हीं बुद्धू राय के नाच पार्टी में भिखारी ठाकुर की नाच पार्टी को मिला (merged) कर प्रभुनाथ ठाकुर (भिखारी ठाकुर के रिश्तेदार) एवं प्रदुमन राय (बुद्धू राय के लड़के) ने चलना शुरू किया। परंतु वर्ष 2015 में जैनेन्द्र दोस्त के नेतृत्व में पुनः नाच पार्टी का अलग अस्तित्व ‘भिखारी ठाकुर रंगमंडल प्रशिक्षण एवं शोध केंद्र’ के रूप में उभर कर आया।
इस रंगमंडल का मुख्य उद्देश्य है भिखारी ठाकुर की नाट्य-परंपरा को परफॉर्मेंस के द्वारा जीवित रखना तथा उसे एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में हस्तांतरित करना है। इस रंगमंडल को पुनर्जीविती एवं संस्थानिकृत करने में समय-समय पर संगीत नाटक अकादमी ने सहयोग प्रदान किया है। रंगमंडल ने ना सिर्फ़ भिखारी ठाकुर के समय के पुराने वस्त्र, मेकअप, वाद्ययंत्र को पुनर्जीवित किया है बल्कि भिखारी ठाकुर के छूट चुके नाटकों को भी नया जीवन प्रदान किया है। इस प्रयास के तहत ‘पिया निसइल’ नाटक को दुबारा से पुनर्जीवित किया गया है। दल छोड़ चुके पुराने कलाकारों को पुनः वापस बुलाकर फिर से उन्हें नाच करने के लिए प्रेरित किया गया है। बुज़ुर्ग कलाकरों को संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार) की ‘कलाकार पेंशन योजना’ के तहत पेंशन दिलवाने के लिए प्रयासरत है। कलाकारों का किसी भी प्रकार का कोई डॉक्युमेंटेशन नहीं था। हमारा रंगमंडल सारे कलाकारों के डॉक्युमेंटेशन के लिए भी प्रतिबद्ध है। अभी हाल फ़िलहाल में हमने ‘नाच भिखारी नाच’ शीर्षक से एक डॉक्युमेंटरी फ़िल्म भी बनाई है जिसमें श्रामचन्द्र मांझी बड़े, लखिचन्द मांझी, श्शिवलाल बारी एवं श्रामचंद्र मांझी छोटे मुख्य भूमिका में हैं।
रामचन्द्र माँझी का बायोडाटा बना कर तथा विभिन्न प्रस्तुतियों के प्रमाण के साथ रंगमंडल पिछले तीन वर्ष से इन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान दिलाने के लिए प्रयास कर रही थी। परंतु कामयाबी नहीं मिली। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 के लिए पहली बार जब रामचंद्र माँझी का नॉमिनेशन हुआ था उस वर्ष यह सम्मान बिहार से रंगकर्मी परवेज़ अख़्तर एवं रामचंद्र सिंह को मिला। रामचंद्र माँझी जब दूसरी बार नॉमिनेट हुए तब यह सम्मान बिहार से लोक गायक ब्रजकिशोर दुबे को प्राप्त हुआ। अंततः तीसरी बार में श्री रामचंद्र माँझी इस पुरस्कार के लिए चुने गए।
भिखारी ठाकुर रंगमंडल में रामचंद्र माँझी ने वर्ष २०१५ से अबतक देश के कई सम्मानित रंगमहोत्सवों में अपनी प्रस्तुतियाँ दी हैं। जिसमें मुख्य है-

भिखारी ठाकुर रंगमंच शताब्दी समारोह – 2017 (छपरा, बिहार) # देशज – 2016 (आज़मगढ़, उ प्र)

संस्कृति संगम – 2017 (नालंदा, बिहार) # नाट्य समागम – 2015 (अगरतला, त्रिपुरा)

नाट्य समागम – 2015 (गुवाहाटी, असम) # नाट्य समागम – 2016 (दिल्ली)

लोक जात्रा – 2017 (मोतिहारी, बिहार) # देशज – 2015 (पुस्तक मेला, पटना)

भिखारी ठाकुर जयंती उत्सव – 2017 (छपरा, बिहार) # सिरजन -2016 (इलाहाबाद)

भिखारी ठाकुर रंग महोत्सव -2016 एवं 2017 (छपरा, बिहार)

राष्ट्रीय लोक नाट्य महोत्सव – 2017 (मधुबनी, बिहार)। # छठ महोत्सव – 2017 (गुड़गाँव, हरियाणा) # भिखारी ठाकुर के रंगमंच के सौ वर्ष – 2017 (जेएनयू, दिल्ली)

छपरा एवं क़ुतुबपुर में आयोजित भिखारी ठाकुर रंगमंच शताब्दी समारोह (दिसंबर 2017) में रामचंद्र माँझी ने कमाल का परफ़ॉर्मेंस दिया था। इस समरोह में उन्होंने ने पिया निसइल नाटक सहित तीन प्रस्तुतियाँ की। इसमें सबसे अहम था इनके ख़ुद के नृत्य संयोजन में किया गया ‘नेटुआ नाच’। इस नृत्य में संगीत नाटक अकादमी के अधिकारियों सहित देश के कई रगकर्मियों ने उनको लाइव देखा एवं खुब सराहा।

साथ ही साथ जेएनयू (दिल्ली) में भी इन्होंने मेरे साथ एक नए तरह का परफ़ॉर्मेंस किया। यह एक ‘interview as aperformance’ ‘performance as interview’ था जिसमें मैं ख़ुद लबार बन कर उनका साक्षात्कार कर रहा था।
बिहार सरकार की उदासीनता


आज जिस व्यक्ति को राष्ट्र की प्रतिष्ठित अकादमी सम्मानित कर रही है उसे अपने ही राज्य में उपेक्षित कर दिया गया है। बहुत दुःख की बात है कि बिहार सरकार ने अब तक अपने धरोहर को कोई सम्मान नहीं दिया है। हमने कई बार प्रयास किया कि सोनपुर मेले में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग (बिहार सरकार) द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में हमें अवसर मिले परंतु ऐसा नहीं हो पाया। हमने यह भी प्रयास किया कि बिहार सरकार द्वारा दिए जाने वाले ‘भिखारी ठाकुर सम्मान’ तथा ‘लाइफ़ टाइम एचीवमेंट सम्मान’ भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके जीवित कलाकारों को दिया जाए परंतु सरकार ने कभी भी हमारे आवेदन पर ध्यान नहीं दिया। हमने कई बार बिहार सरकार को ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए भी लिखा ताकि भिखारी ठाकुर की नाट्य परम्परा को हम युवाओं में हस्तांतरित जार सकें पर सरकार ने कभी संज्ञान नहीं लिया। इन सारे सिलसिलों में हम तत्कालीन मुख्यमंत्री जितन राम माँझी से भी मिल चुके हैं पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द हीं बिहार सरकार अपने सामाजिक-सांस्कृतिक हीरो को पहचानेगा एवं उन्हें उचित सम्मान देगा।
और सबसे अंत में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष, निर्णायक मंडल के सभी सदस्यों, रामचंद्र माँझी को अपनी लेखनी, फ़ोटो, विडियो द्वारा इस डिजिटल दुनिया में सबके सामने लाने में सहयोग करने वाले सभी पत्रकारों एवं मित्रों का हम भिखारी ठाकुर रंगमंडल की तरफ़ से आभार प्रकट करते हैं। नाच परंपरा के जीवित किवंदिति जिनके रग-रग में भिखारी ठाकुर बसे हुए हैं उस सम्मानित कलाकर श्री रामचंद्र माँझी को ढेरों बधाइयाँ।
नोट: यह आलेख एक लम्बे एवं गहरे शोध तथा नाच में रामचंद्र माँझी के अनुभव के आधार पर लिखा गया है।
जैनेन्द्र दोस्त
निर्देशक, भिखारी ठाकुर रंगमंडल प्रशिक्षण एवं शोध केंद्र, छपरा (बिहार)
पीएच.डी. रिसर्चर, जेएनयू, दिल्ली
संपर्क: 9560695145 Email: [email protected]

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